हरियाणा का सम्पूर्ण इतिहास – History of Haryana In Hindi

देश में अपनी कृषि, खेल, मनोरंजन ना जाने कितनी ओर चीजों की ताकत दिखाकर । हरियाणा ने अपनी पहचान बनाई है। 1 नवम्बर 1966 को पंजाब में से अलग कर हरियाणा का जन्म हुआ। लेकिन एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक इकाई के रूप में हरियाणा का अस्तित्व पुराने समय से ही बना हुआ है। अपने रहन सहन ओर बोली के कारण यह देश में हमेशा चर्चित रहा है। 

History Of Haryana In Hindi

रियाणा शब्द का अर्थ

इसके नाम में ही भगवान का वाश होता है। क्योंकि हरियाणा शब्द का अर्थ है “जहां भगवान का निवास करते हों” जो संस्कृति शब्द ‘हरि’ ओर ‘अयण’ से मिलकर बना है। 
1. जिसमे हरि शब्द का मतलब होता है – हिन्दुवों के देवता विष्णु
2. अयण शब्द का अर्थ होता है – निवास करना 
अर्थात जहां भगवान विष्णु निवास करते हों।

हरियाणा राज्य की स्थपना

देश की आज़ादी के पहले ही देश में भाषा के आधार पर देश में नए राज्य बनाने के मांग उठ रही थी। देश के महान राजनेता पंडित जवाहर लाल नेहरू और महत्मा गाँधी भी इस पर विचार कर रहे थे।

लेकिन देश की आज़ादी के करीब आते आते और देश के उस टाइम के माहौल को देख कर भाषा के आधार पर राज्यों का गठन करना उचित नहीं समजा। क्योकि देश का केंद्रीय नेतृत्व भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के खिलाफ था। लेकिन देश भर में उनके इस फैसले को नजारा गया और आंदोलनों की सुरुवात हो गयी।

राज्य की मांग के लिए आंदोलन

सबसे पहला आंदोलन आंध्र प्रदेश को बनाने के लिए हुआ। इसके लिए पोट्टी श्रीरामुलु ने अलग आंध्र की मांग के लिए 58 दिन का अनशन किया। 58वे दिन अनशन के दौरान ही उनकी मोत हो गयी। जिसके विरोध में पूरा राज्य हिंसक हो उठा।

जनता के इस आंदोलन के दबाव को देखते हुए 1 अक्टूबर 1953 को तेलुगु भाषा के आदर पर अलग आंध्र प्रदेश का गठंन किया गया। जिससे और राज्यों की मांग और बढ़ गयी जैसे पंजाब, हरियाणा , महाराष्ट्र। सबसे ज्यादा मांग तेजी से पंजाब के लिए उठ रही थी। जिसका नेतृत्व कर रहे थे संत फ़तेह सिंह और मास्टर तारा सिंह।

वहीं दूसरी और हरियाणा राज्य की मांग के लिए हरियाणा का नेतृत्व कर रहे थे चौधरी देवीलाल और प्रोफेस्सर शेर सिंह।
1965 में अलग पंजाब की मांग का आंदोलन का नेतृत्व करते हुए संत फ़तेह सिंह आंदोलन पर बैठ गए। इस आंदोलन के दबाव के कारण पंजाब के बटवारे की मांग जनसँग ने छोड़ कर सब ने मांग ली।

राज्य का जन्म

11 जनुअरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद देश की कमान इन्द्रा गाँधी ने संभाली। इन्द्रा गाँधी ने पंजाब के बटवारे की मांग को स्वीकार कर लिया। 23 अपरिअल 1966 को जयंतीलाल छोटेलाल शाह के नेतृत्व में एक सीमा आयोग का गठन किया गया। आयोग ने 31 मई 1966 को सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। जिसमे हिसार, रोहतक, नरवाना, अम्बाला, महेंद्रगढ़, गुरुग्राम को भाषा के आधार पर हरियाणा में शामिल करने की सिफारिश की गयी।


3 सितम्बर 1966 को केंद्रीय गृह मंत्री गुलज़ारी लाल नंदा ने लोक सभा पंजाब पुनर्गठन बिल प्रस्तुत किया। जिसमे कहा गया की पंजाब और हरयाणा की सभी सरकारी सम्पति बाटी नहीं जाए गई। जैसे उच्चन्यालय, विश्विद्यालय, बिजली बोर्ड, आनाज गोदाम आदि। 7 सितम्बर 1966 को बिल पास हो गया। और एक नवम्बर 1966 को हरियाणा अलग राज्य बन गया।

Read Also – दिल्ली के 10 सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल -Tourist Place In Delhi in Hindi

हरियाणा की महत्वता

अगर हम इसकी देश में महत्वता के बारे में बात करे तो यह एक कृषि राज्य के रूप में निकल कर आता है। इसे देश में कृषि उत्पादन में अग्रणी स्थान प्राप्त है। कृषि के साथ-साथ यह खेलों में भी इसका स्थान अग्रणी है। यह देश को हर साल ओर राज्यों की तुलना में ज्यादा ओर काबिल खिलाड़ी देता है। 

हरियाणा की संस्कृति अपना एक अलग वजूद बनाये हुये है। जो देश के बाकी राज्यों से बहुत अलग और सुंदर है। यहां के खेत,लोगों का आपस में मेल-जोल,ग्रामीण जीवन हर किसी को मोह लेता है।

लेकिन भाग दौड़ भरे इस जीवन के आधुनिक युग में, यह संस्कृति और रीति-रिवाज़ गुम होते जा रहे है। आजकल के युवा अपने हरयाणवी रीतिरिवाज़ को भूल कर विदेशी रीतिरिवाज़ों को और बढ़ते जा रहे हैं।

प्राचीन ऐतहासिक स्थल खंडरों में तब्दील हो रहें है। हरियाणा की संस्कृति गावों कस्बों को छोड़ कर किसी संग्रालय में सजती जा रही हैं। जो इस प्रदेश की संस्कृति के लिए बहुत निराशाजनक है।

हरियाणा संग्रहालय –

हरयाणवी संस्कृरति को संजो कर रखने के लिए चौधरी चरण सिंह विश्विद्यालय, हिसार ने इसके लिए पहल की। यहां एक संग्रहालय की स्थापना की गयी जो देश का एकमात्र ऐसा संग्रहालय है। जो अपने प्रदेश की प्राचीन पूर्ण कृषि सामग्री तथा ग्रामीण संस्कृति और रीतिरिवाज़ों को संजो कर रखे हुये है।

यह संग्राहलय प्राचीन हरयाणवी संस्कृति की याद दिलाता है। इस बहुरूपी व बहुउपयोगी संग्रहालय में हरियाणा का प्राचीन जनजीवन , रहन-सहन , कृषि के लिए उपयोग किये जाने वाले औज़ार, लोक परिधान, लोक साहित्य, हस्त कला आदि का एक बहुत सुंदर संग्रह है। जो दर्शकों को पुराने जनजीवन की याद दिलाता है।

Leave a Comment