लोहार्गल का इतिहास, मंदिर, धाम और महत्व – Lohargal History Temples Dham Surya kund

लोहार्गल एक खूबसूरत स्थान है ओर पर्यटन के लिए बहुत पसंद किया जाता है। जो कि राजस्थान राज्य का बहुचर्चि स्थान भी है। यह झुन्झुनूं जिले से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उदयपुर वाटी कस्बे से 10 km की दूरी पर स्तिथ है। यह चारों ओर पर्वतों से घिरा हुवा है।

लोहार्गल इतिहास:-

यह राजस्थान प्रांत के एक बहु चर्चित ओर प्रसीद तीर्थ स्थल है। वेद पुराणों में अक्सर इसका जिक्र मिलता है। यह तीर्थ अपनी सुंदरता के कारण एक दार्शनिक स्थल भी है। बीते समय में यहाँ ऋषि मुनि रहते थे पर अब यहाँ लोग भी रहने लगे।

देखा जाए तो ये एक ऋषि भूमि है क्योकि यहां ऋषि मुनि आ कर कठोर तपस्या करते थे। ओर अपनी भगती परिचय देते थे। यह स्थान बहुत शूद्ध ओर शांत वातावरण रखता है।

इसलिए यह तप्सिवियों का पसन्दीदा स्थान बना। लोहार्गल शब्द का अर्थ है। जहां लोहा भी गल जाए।इसलिए यहां ऋषि-मुनि, देवी-देवता अपनी आत्मा सुद्धि के लिए आते थे।

पांडवों को मुक्ति मिली:-

एक कथा के अनुसार जब पांडवों ने युद्ध जीत लिया तो उन्हें मन ही मन अपने आप से नफरत होने लगी कि उन्होंने अपने भाई बन्दुवों को मार कर पाप किया है। इसलिए वे अपने पापों की शुद्धि के लिए जगह-जगह तीर्थ स्थलों पर घूमते गये।

तब उन्हें श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि जिस तीर्थ स्थान पर तुम्हारे हथियार गल जाएं। वही तुम्हे आत्मा की शुद्धि मिले गी।

इस प्रकार जब पांडव लोहार्गल के घाट सूर्य कुण्ड पर पहुंचे और स्नान किया तो उनके हथियार गल गये ओर फिर उन्हें भगवान शिव की आराधना कर मुक्ति मिली।

जिस प्रकार लोहार्गल के साथ अनेक रोमांचक कहानियां जुड़ी हुई है। यह देखने में ओर भी रोमांचक और सुंदर है। इसका क्षेत्र खूबसूरत वनों से सुशोभित है।

इस पवित्र भूमि की सुंदरता मंत्र मुग्ध कर देने वाली है। इसकी ऊँची ऊंची पहाड़ियां की खूबसूरती दर्शको के मन को मोह लेती है। दूर-दूर से लोग इस प्रकृति के करिश्मे को देखने आते है। 

महर्षि परशुराम:-

एक पुराण के अनुसार कहते हैं कि महर्षि परशुराम जी ने भी अपने पापों का प्रश्य्चित के लिये इसी पूण्य क्षेत्र में यज्ञ किया था।

जिसमें इन्द्रादि देवता एवं वशिष्ठ ऋषि मुनि आये और यहाँ की सुंदरता को देख कर वे भी मन्त्र मुग्द हो गए। अंतः महृषि परशुराम यज्ञ समाप्ति के अंतराल भी माल क्षेत्र के पर्वतों पर चिरकाल तक तप करते रहे।

आदि पुराण में लोहार्गल का जिक्र:-

पुराणों में से एक “आदि पुराण” में लोहार्गल का जिक्र किया गया है।इसमे आदि वराह भगवान कहते है ( एक संस्कृत श्लोक में) कि हे देवी! जो तू मुझसे गुप्त तीर्थ स्थानों के बारे में पूछती रहती है

तो सुनों:-सिद्धवट के समीप मलेछों की बस्ती के बीच में लोहार्गल नाम का मेरा निवास स्थान है। जो खूबसूरत शिखरों से चारों ओर से ढका हुवा है। इस तीर्थ में 15 गुप्त तीर्थ है जिनका क्षेत्र बीस कोश है। यह तीर्थ मेरे पुण्यात्मा भगतों के लिए सुलभ है।

यहां उत्तर दिशा में मेरा निवास है। ब्रह्मा ,रुद्र, अस्विनीकुमार, इंद्र, चन्द्रमा, बृहस्पति आदि समस्त देवताओं का यहां निवास है। में अपने इस क्षेत्र की रक्षा करता हूं।

जब भी मेरे इस क्षेत्र पर कोई मुसीबत आती है तो में वैष्णव माया के प्रभाव से हर मुसीबत को परास्त कर देता हूँ। यहां पर एक पर्वतों से धारा लाल रंग की गिरती है।

जो भी कोई उसमें सात रात्रि स्नान करता है। वह सीधे ब्रह्मलोक को सिद्धि प्रप्त कर लेता है। सीधी की कामना वाले लोगों को यहां अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है। अथार्त वे स्वर्ग के भागी बनते है।

देखिये राजस्थान के कुछ और प्रमुख पर्यटन स्थल

लोहार्गल में बावड़ी:-

लोहार्गल के प्रवेश द्वार पर चेतना दास जी की बावड़ी है ओर साथ ही राधारमण का मंदिर जिनकी खूबसूरती आपका मन मोह लेगी।

चेतनदास जी एक बहुत बड़े महात्मा साधु थे। उन्ही के दान के कारण लोहार्गल का विशाल कुंड बन पाया।

इस बावड़ी के बारे में एक कहानी भी प्रचलित है। कि चेतनदास के यहां आवगमन से पहले यहां वनखण्डों नाम के दो साधु रहते थे।

जब महात्मा चेतनदास ने बावड़ी का निर्माण करना शुरू किया तो जितना मजदूर दिन में गड्डा खोदते बावड़ी के लिए सुबह सब एक समान हुवा मिलता जैसे यहां कुछ हुवा ही न हो।

तो इसी प्रकार ये शिंशिला कुछ दिन चलता रहा पर चेतनदास जी हर बार गड्डा खोदने में विफल रहे। आखिर हारकर चेतनदास ने जब संतों से पूछा की महात्मा जी आप क्या चाहते हो? वनखण्डों ने हंस कर जवाब दिया कि आप क्या चाहते हो, चेतनदास जी जवाब में में अपना नाम चाहता हूं।

तो उन्होंने भी यही उत्तर दिया कि हमें भी अपना नाम चाहिए। तो इसी प्रकार चेतनदास जी ने पर्वत के सबसे ऊंचे शिखर पर एक छतरी का निर्माण करवाया जो वनखण्ड के नाम से प्रसिद्व हुई। इस चोटी से दूर दूर का बहुत की सुंदर नज़ारा दिखाई देता है।

लोग बड़े चाव से इस सुंदर दृश्य को देखने के लिए यहां चढ़ते है। और प्रकृति के दृश्य का आनंद लेते है। पहले यहां चढ़ना बहुत कठिन और खतरों से भरा हुवा था। पर अब सब व्यवस्था ठीक कर दी गयी है।

लोहार्गल के मंदिर, उनका महत्व और इतिहास:-

लोहार्गल महात्म्य में है। जलाशय के ऊपर जो वटवृक्ष है यह भी बहुत प्राचीन समय से है। इतना ऊंचा वटवृक्ष शायद ही कहि देखने में आया हो। इस स्थान पर दो तीन गुफा भी है जो देखने लायक है।

इस स्थान को हमेशा से ही शुद्ध और पवित्र माना गया है। यहां बहुत सारे तपस्वी महात्मा सिद्ध हुये हैं। इसलिए यहां बहुत सारे मंदिर भी है जिनमे से कुछ प्रमुख ये हैं।

चार सम्प्रदाय खाखीजी का मंदिर:-

यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय का सर्वमान्य सर्वोच्च मंदिर है। यहां के महंत की आज्ञा मात्र वैष्णव साधुओं के शिरोधाय होती है। देश के अलग-अलग बागों से तीर्थ यात्री इस मंदिर में आ रुकते हैं

यहां खाखीजी श्री जनार्दनदास जी अच्छे प्रख्यात महात्मा सिद्ध हुए हैं। जिन के चमत्कार चमत्कार पूर्ण कर्मों की चर्चा आज भी जन-जन के मुंह पर आती हैं।

यहां सैकड़ों साधु महीनों तक जमे रहते हैं और हर रोज नए नए पकवानों पकवानों से भोग लगाते हैं कोई भी यात्री इस मंदिर से बिना खाएं लौट नहीं सकता। खाखी जी महाराज लक्ष्मी नरसिंह के अन्य भगत थे थे।

श्री विग्रह के सम्मुख ही घर बैठे कर इनका रात दिन बीतता था। आज भी इस मंदिर की पूजा अर्चना अतिथि सत्कार अन्य मंदिरों के लिए आदर्श रूप है।

मलखेत मालकेतु ( मालकेतु)लोहार्गल यात्रियों के लिए मालखेत ओर बनखंडी ये दोनों स्थान विशेष आकर्षण का केंद्र बनते है। किन्तु वनखंडी अपनी ऊँचाई के लिए प्रशिद्ध है। मालकेतु की ओर ज्यादा मान्यता है।

इस मंदिर के निर्माता महात्मा सेवानंद जी हुए है। जो लश्करी सम्प्रदाय के साधु थे। इन्होंने ही अपना धन खर्च करके यहां एक श्री रघुनाथ जी का विशाल मंदिर ओर मालकेतु जी का मंदिर बनवाया।

मालकेतु के प्रवेश द्वार पर एक इमली का पेड़ है। जिस पर लोग कच्चे शुत धागा बाँध कर कोई मनोकामना मांगते है। प्रतिवर्ष लाखों धागे बांधे जाते है। यही इस मंदिर के चमत्कार का प्रतीक है।

सुर्य मंदिर : सूर्यकुण्ड

lohargal history temples
Source

यह मंदिर एक तरफ से एकता का प्रतीक है। यहां किसी को आने-जाने की मनाही नही है। यह लोहार्गल का सबसे ज्यादा चर्चित ओर परषिद मंदिर है। यहां हर साल दूर दूर से लोग आकर आराधना पूजा करते है।

हर साल यहाँ बड़े बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। यहाँ का दृश्य देखने लायक होता है। और देश पवित्र कुण्डों में से एक कुंड यह भी है जिसे सूर्य कुण्ड कहते है। इस कुंड में हमेशा नाभि तक का पानी रहता है। क्योंकि इसकी गहराई इतनी ही है और ये इतना ही पानी ले सकता है ।

पानी की मात्रा आदिक होने पर इसका पानी पास में फैले एक मील तक के बागों में निकल जाता है। पांडवों के अस्र सस्त्र यही गले थे और उन्हें मुक्ति मिली थी।

कभी कभी इसमे दूध से जल देखा गया है। साधु संत इसको दूध की गंगा बताया करते है। इसकी सबसे विचित्र बातबीर है कि जिस दिन सूर्य कुंड का पानी सफेद होता है।

उसी दिन शंकभरी ओर किरोड़ी का पानी भी सफेद दूध जैसा हो जाता है।यह स्थान रघुनाथगढ़ की दिशा में मालकेतु मंदिर से पश्चिम की ओर एक विहड़ नाले में है।

लोहार्गल की समस्त स्थानों की अपेक्षा यहां ज्यादा हरियाली है। स्थानीय लोगो के अनुसार इस जगह पर कुछ कहानियां भी पर चलित हैं। जैसे:-

सूर्य कुंड पर बहूचर्चित कहानी:-

1. इस कुंड पर एक बहु चर्चित कहानी भी प्रचलित है। जो कि काशी के राजा सूर्यभान पर आधारित है। जिसमे बताया जाता है कि जब राजा के घर वृद्धा अवस्था में पुत्री का जन्म हुआ। तो राजा बहुत दुखी हुए क्योकि उनकी पुत्री का एक हाथ क्षति ग्रस्त था।

राजा ने अपनी पुत्री को स्वस्थ करने के लिए बहुत उपाय किये। ओर बड़े बड़े विद्वानों से उसे ठीक करने को कहा।जब भूत-भविष्य देखने वाले विद्वानों ने कहा कि लोहार्गल में सूर्य कुण्ड के घाट पर एक बरगद के पेड़ पर शिकारी एक बंदरियां को मार कर टांग गए थे। क्यो बंदरियां का माँस अभक्ष्य होता है।

इस प्रकार बंदरियां का शरीर समय के साथ टूट कर कुंड के पानी में गिर गया और शुद्ध हो गया। ओर हाथ वहीं बरगद के पेड़ पर टँगा रह गया और उसी बंदरियां का जन्म आपके घर हुवा है। इसलिए आपकी पुत्री का हाथ क्षति ग्रस्त है।

इसलिए आप वहां जाइये ओर उस हाथ को वहां से खोल कर कुंड में बहा दीजिये। राजा ने ऐसा ही किया और उनकी   पुत्री का तुरंत ठीक हो गया । राजा इस सूर्य कुंड की शक्ति और चमत्कार देख कर बहुत प्रभावित हूए।

उन्होंने इस कुण्ड का बहुत सुंदर निर्माण करवाया और उसको एक खूबसूरत तीर्थ स्थल में बदल दिया। सूर्य कुण्ड ओर सूर्य मंदिर की बहुत मान्यता है।

दूसरी कहानी: –

2. एक समय कोई बकरी चराने वाला चरवाहा झुंड से पिछड़ी हुई अपनी बकरी की तलाश में घूम रहा था। इतने में एक साधू दिखई दिया ओर साथ ही उसकी बकरी एक तरफ चरती दिखई दी।

चरवाहे ने साडू को प्रणाम किया और बकरी की तरफ उससे लेने के लिए चल दिया । तभी साधु ने विन्रम भाव से कहा कि बच्चा ! दूध चाहिए चरवाहे ने कहा कि बकरी के दुध नही है।

साधू ने मुस्कुराते हुए कहा कि जरा निकल कर तो देखो। जब चरवाहा बकरी की तरफ दूध निकालने गया तो उसके स्तनों में दूध आ गया ।

चरवाहा ये देख कर दंग रह गया। चरवाहा साधु की शक्ति को देख मंत्रमुग्ध हो गया ओर उसकी सेवा में वही रहने लगा।बाबा गुफाओं में ओर चरवाहा गुफा के बाहर रहता।

कुछ दिनों बाद जब घर वाले उससे ढूंढने वह पहुंचे तो उसने उस शक्तिशाली साधू के बारे में बताया और घर चलने से इनकार कर दिया। जब साएंकाल वह साधु की सेवा में गया तो उससे न तो साधु मिला ना ही गुफा।

तीसरी कहानी वराह मंदिर के महंत स्वामी डुंगजी की है। ढूंढी इस नाले में घास काट रहे थे जेठ का महीना कड़ाके की धूप प्यास के मारे डुंगजी मूर्छित से होकर पड़े रहे। कुछ क्षण बाद कोनों ने सुना क्यों पड़ा है तेरे सामने ही तो पानी है।

स्वामी जी ने आंखें खोली स्वर मनुष्य का था किंतु कोई कोई दिखाई नहीं दे रहा था। सामने देखा एक घास की जड़ में कुछ मधुमक्खियां मंडरा रही हैं। सोचा यही जल हो। तो।

तो इसलिए डुंगजी ने वहीं से घास उखाड़े और उखाड़ ते ही जल की धारा चल पड़ी। परंपराओं में यह भी सुना है कि यहां वशिष्ठ जी ने ने तपस्या भी की थी थी।

लोहार्गल के बारें में वीडियो:-

Leave a Comment